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samay ka bhar

तुम्हें ढोना है समय का भार,थोड़ी सी चाल तेज करो, थोड़ी ,थोड़ी सी, थोड़ी सी मेरे यार , थोड़ी सी चाल तेज करो माँगने से रौशनी मिलेगी ना कभी, रौशनी के वास्ते मशाल लाईये, जिंदगी को जिन्दगी बनाने के लिए जिंदादिल इरादों में उछाल लाईये मुर्दा है व्यवस्था तो बदल दीजिये,धीमे-धीमे रक्त में उफान लाईये सूरज तिजोरियों में बंद है अगर, तोड़िये तिजोरियाँ निकाल लाईये पूरी पीढ़ी होगी इसकी जिम्मेदार,थोड़ी सी चाल तेज करो. तुम्हें ढोना है समय का भार,थोड़ी सी चाल तेज करो, थोड़ी ,थोड़ी सी, थोड़ी सी मेरे यार , थोड़ी सी चाल तेज करो

tiranga

दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इसका मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इसकी सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूं चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

ladkiyan

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raat aadhi

रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी। तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी। मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे अधजगा सा और अधसोया हुआ सा। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में। इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू बह रहे थे इस नयन से उस नयन में। मैं लगा दूँ आग इस संसार में है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर। जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने के लिए था कर दिया तैयार तुमने! रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। प्रात ही की ओर को है रात चलती औ उजाले में अंधेरा डूब जाता। मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी खूबियों के साथ परदे को उठाता। एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था और मैंने था उतारा एक चेहरा। वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। और उतने फ़ासले पर आज तक सौ यत्न करके भी न आये फि...

mang ki sindoor rekha

मॉग की सिन्दूर रेखा तुमसे ये पूछेगी कल, यूं मुझे सर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है। तुम कहोगी वो समर्पण बचपना था तो कहेगी, गर वो सब कुछ बचपना था तो कहो फिर प्यार क्या है। — 2 कल कोई अल्हड़ अयाना बाबरा झोंका पवन का, जब तुम्हारे इंगितों पर गन्ध भर देगा चमन में या कोई चंदा धरा का रूप का मारा वेचारा, कल्पना के तार से नक्षत्र जड देगा गगन पर तब यही विछुये, महावर, चुडियां, गजरे कहेंगे, इस अमर सौभाग्य के श्रंगार का अधिकार क्या है। मॉग की सिन्दूर रेखा तुमसे ये पूछेगी कल, यूं मुझे सर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है। तुम कहोगी वो समर्पण बचपना था तो कहेगी, गर वो सब कुछ बचपना था तो कहो फिर प्यार क्या है। कल कोई दिनकर विजय का सेहरा सर पर सजाये, जब तुम्हारी सप्तवर्णी छांव में सोने चलेगा या कोई हारा थका व्याकुल सिपाही तुम्हारे, वक्ष पर धर सीस हिचकियां रोने लगेगा तब किसी तन पर कसीं दो बांह जुड कर पूछ लेंगी, इस प्रणय जीवन समर में जीत क्या है हार क्या है। मॉग की सिन्दूर रेखा तुमसे ये पूछेगी कल, यूं मुझे सर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है। तुम कहोगी वो समर्पण बचपना था ...

vande matram

vande matram

tumahara phone aya hai

अजब सी ऊब शामिल हो गयी है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चैखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अंगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौके पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़्याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बाद हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बाद राहत का पहर जैसे बड़ी ग़ुमनामियों के बाद शोहरत की मेहर जैसे सुबह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उन्वान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है